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एक काव्यमयी शाम ........फरगुदिया की याद में लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तुम निश्चिंत रहना : श्री किशन सरोज

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  तुम निश्चिंत रहना कविता से प्रेम आपको स्वयं से भी प्रेम करना सिखा देता है। आप जब व्यस्त ज़िन्दगी से कुछ पल कविता के लिए देते हैं तो अपरोक्ष रूप से वो समय आप ख़ुद को दे रहे होते हैं। अपने ह्रदय,अपने मन को दे रहे होते हैं। आज की सुबह हर सुबह जैसी ही व्यस्त थी लेकिन मुझे कुछ पल चुराने थे अपने बेहद प्रिय गीतकवि आदरणीय श्री किशन सरोज जी की स्मृतियों में एकाग्र होकर उनके शब्दों के पूजन के लिए। सो मैंने चुरा ही लिए। अपने स्वर में किशन सरोज जी का गीत गाकर मन तृप्त है। उनका हर गीत प्रेम की आराधना है। आज उनकी प्रथम पुण्यतिथि है। अंकल अपनी सोनरूपा बिटिया का प्रणाम स्वीकारिये। हम सब बहुत याद करते हैं आपको।

दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों के इंकलाबी तेवर

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तुमने इस तालाब में रोहू पकड़ने के लिए, छोटी-छोटी मछलियाँ चारा बनाकर फेंक दीं. हम ही खा लेते सुबह को भूख लगती है बहुत, तुमने बासी रोटियाँ नाहक उठा कर फेंक दीं. नई कविता की खुरदुरी बयानगी से उकताए पाठकों के लिए दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों की मशालें एक नया उजाला लेकर आईं।आशावान समाज जब तत्कालीन सत्ता की हिटलरी कार्यशैली से निराश हो कर क़िस्मत की ढहती दीवार पर सिर टिकाये बैठा था उस समय उनकी ग़ज़लें उसके दर्द की सहोदर प्रतीत हुईं। सर्वरूपेण,सर्व संवेद्य,जागरूक और जनमानस के द्वारा सर्वाधिक स्वीकार्य दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों के इंकलाबी तेवर जनमानस की आवाज़ बने।अविस्मरणीय ग़ज़लों के प्रणेता दुष्यंत कुमार की आज पुण्यतिथि है। एक बार पुनः उनका लेखन उसी विराटता के साथ सामने उपस्थित हो गया है जैसे तत्कालीन समय में बिगुल की तरह बजा था। प्रणाम उन्हें

शब्द समर्पण

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शब्द समर्पण   एक महीने पहले फेसबुक पर  ख़ुद को एक और नए ग्रुप में जुड़ा हुआ पाया .....नाम था 'फरगुदिया ...स्त्री के अंतर्मन में उठे प्रश्न और समाधान ' नाम थोड़ा अलग सा था .....मैंने ग्रुप का पेज ओपन किया फिर उसके बनाये जाने के मकसद पर मेरा ध्यान गया  .......मुझे पता चला कि ये ग्रुप दिल्ली की रहने वाली एक होम मेकर जिनका नाम 'शोभा मिश्रा 'है , उनका है जिन्होंने अपनी बचपन की मित्र जिसका नाम 'फरगुदिया 'था उसकी याद में बनाया है...... मात्र १४ वर्ष की उम्र की थी फरगुदिया जब वह किसी की दरिंदगी का शिकार हुई और जब गरीब, बेसहारा और एक गाँव में घरों में काम-काज कर अपने परिवार का पालन-पोषण करने वाली उसकी माँ ने उसका गर्भपात करवाया तो उसकी मौत हो गई............. संवेदनाओं को समर्पित इस ग्रुप से और शोभा दीदी से लगाव कुछ बढ़ गया था ...फोन से भी बातचीत होने लगी इस बीच एक कर्यक्रम के लिए उनका फोन मेरे पास आया ...उनका मन था कि  उसी फरगुदिया और उसकी जैसी हज़ारों-लाखों-करोड़ो ं फरगुदियाओं की याद में एक शाम रखी जाये  जिसमें कुछ कवयित्रियाँ इस तरह की कुकृत्यों के व...