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हिन्दी ग़ज़ल और डॉ. उर्मिलेश (परिचय)

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  ख़ुश हूँ कि आख़िर डेढ़ वर्ष की समवेत मेहनत का परिणाम आ ही गया इस संग्रह के रूप में। और आज के दिन इसकी सूचना मैं इसीलिए भी देना चाहती थी जिस दिन डॉ. उर्मिलेश ने अपने जाने का दिन चुना उसी दिन हमने उन्हें अपने भीतर ज़िंदा रखने को चुना। समकालीन ग़ज़ल के सर्वाधिक सक्रिय-सार्थक ग़ज़लकारों की अग्र पँक्ति में डॉ उर्मिलेश के नाम का उल्लेख किया जाता है।हिन्दी ग़ज़ल की यात्रा,परम्परा और विकास का अगर अध्ययन करना है तो डॉ उर्मिलेश को पढ़े बिना ये अधूरा रहेगा।इसमें कोई दो राय नहीं हैं।न केवल उनकी ग़ज़लें वरन उनका चिन्तनशील गद्य साहित्य भी हिन्दी ग़ज़ल के प्रति उनकी दृष्टि को समझने के लिए अत्यंत आवश्यक है।इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए डॉ उर्मिलेश ग़ज़ल के लिए अनथक श्रम और समर्पण को एक जिल्द में बाँधने का कार्य 'हिन्दी ग़ज़ल और डॉ. उर्मिलेश' के रूप में शीघ्र ही आपके सामने होगा। वरिष्ठ कवि एवं हिन्दी ग़ज़ल के अध्येता आदरणीय हरेराम समीप जी की प्रेरणा और निरन्तर परामर्श से मैं इस संग्रह के सम्पादन का बीड़ा उठा पाई।मुझ पर उनके विश्वास और अपने अभिन्न मित्र उर्मिलेश के द्वारा ग़ज़ल में योगदान के प्रति उनकी निष्ठा ...

परशुराम जयंती विशेष

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  आज अक्षय तृतीया चिरंजीवी भगवान् परशुरामजी के जन्मोत्सव का दिन है। सनातन धर्म में तीन 'राम' विष्णु के अवतार हैं। परशुरामजी, रामजी और बलरामजी। इनकी एकसाथ 'राम-त्रय' कहकर स्तुति की जाती है। लेकिन दुर्भाग्यवश आज परशुराम और राम को हीन राजननीतिक दृष्टिदोष के कारण जातीय परिमाप से नापने की कोशिश होती दिख रही है। नदी, पर्वत, पशु, पक्षी, तीर्थ, व्रत, त्याग, युद्ध और प्राणिमात्र के साथ चारों वर्णों के असंदिग्ध महत्व का प्रतिपादन कभी रोका नहीं जा सकता। साथ ही किसी एक को सम्मान देना अन्यों का अपमान नहीं हो सकता। अपितु एक के यशवर्णन में प्रसंगतः और परोक्षतः सभी का महत्त्व संसूचित होता है। यही हमारी संस्कृति की अद्भुत बिनावट है। अंत में यह कह दें कि भगवान् परशुरामजी क्षत्रियों के विरोधी नहीं, अपितु विलासी और प्रजापालन में दोषी क्षत्रपों के विरुद्ध महाक्रांति के प्रतीक थे। जिसकी जरूरत आज भी जस की तस है। ऐसा न होता तो श्रीराम को पहचानकर वे शस्त्र रख क्यों देते? वस्तुतः दशरथनन्दन राम को भगवान् होने का प्रमाण क्रमशः तीन प्रतापी ब्राह्मणों ने ही दिया। प्रारंभ में महर्षि वशिष्ठ ने प्रेम स...

अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये

सृष्टि का आधार हैं,संरचनाएँ हैं जीवन की इंद्रधनुषी छटाएँ हैं धूप में छाँव देने वाली प्रथाएँ हैं रिश्तों को संजोने वाली सभ्यताएँ हैं त्याग,तप,शौर्य, धैर्य की कथाएँ हैं हम भोर सी पुनीत भावनाएँ हैं इसलिए काम ये ज़रूर कीजिये अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये! ज़िन्दगी को जन्म देने के सुभागी हम घर के ज़र्रे ज़र्रे के अनुराग हम प्रेम,त्याग,ममता के अनुगामी हम मन की कठोरता के प्रतिगामी हम चाँद पर भी क़दम रख आये हैं हिम आलय की बर्फ़ चख आये हैं गर्व ख़ुद पर बदस्तूर कीजिये अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये! नदिया की धार कभी मुड़ती नहीं बेगवान वायु कभी रूकती नही पर्वतों की श्रृंखलाएं झुकती नहीं जोश भरी वाणी कभी घुटती नही आप किसी से भी कमज़ोर नहीं हैं आँसू भरे नयनों की कोर नहीं हैं मन से समस्त भ्रम दूर कीजिये अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये! पिता,पति,पुत्र का प्रशासन सहें भीतर भीतर रोज़ ख़ुद को दहें कब तक सबके आदेशों को सुनें ज़िन्दगी को अपने तरीक़े से जियें बहुत हुआ ये शोषण का सिलसिला क़िस्मत से न अब कीजिये  गिला  शिक्षा से ये अन्धकार दूर कीजिये अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये! अपने हितों के प्रति मुखर बनें स्वाभिमान वाला नेक...

शुभकामनायें

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स्वतंत्रता दिवस की आप सभी को  बहुत बहुत शुभकामनायें  भारत के अंग्रेजों से स्वतन्त्र होने की ६५ वीं वर्षगाँठ पर सब भारतवासियों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें ............... शीघ्र ही हम स्वयं भी तंत्र के साथ "स्व -तंत्र 'होने की वर्षगाँठ मनाएँ ........... ~ हिंद जय भारत ~