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साथ अपने ले गया बचपन

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  एक सीधा सा सरल सा मन साथ अपने ले गया बचपन फ़िक्र से अंजान रहते थे पँछियों जैसे चहकते थे इंद्रधनु जैसी लिये मुस्कान चुलबुली नदिया सी बहते थे मस्तियों से गूँजता आँगन साथ अपने ले गया बचपन हम थे मौलिक गीत के गायक रह गये अब सिर्फ़ अनुवादक कहने को आज़ाद हैं लेकिन ख़्वाहिशों के बन गए बंधक तृप्ति का, संतुष्टि का हर क्षण साथ अपने ले गया बचपन प्रेम को व्यापार कर बैठे ज़िन्दगी रफ़्तार कर बैठे जो नहीं था ज़िन्दगी का सच झूठ वो स्वीकार कर बैठे सच को सच कह्ता हुआ दर्पण साथ अपने ले गया बचपन रहके अपने आप तक सीमित साधते रहते हैं अपना हित स्वार्थ की पगडंडियों पे चल कर रहे हैं ख़ुद को संचालित भोर की किरणों सा भोलापन साथ अपने ले गया बचपन {बचपन जैसे हिमालय से निसृत गंगा,बिल्कुल कोरा,निर्मल,निश्छल। फिर जिस तरह बहते-बहते न जाने कितनी मिलावटें नदी में होने लगती हैं उसी तरह उम्र के बढ़ने के साथ-साथ हमारे अंदर से भी वो प्यारी सी कोमलता,निश्छलता,निर्मलता ख़त्म होने लगती है।उसी आकलन का ये गीत} #sonroopa #hindipoetry #pichlebaraskagulmohar

ग़ज़ल

ग़ज़ल ल गभग पन्द्रह दिन पहले दिल्ली से वापस लौटते समय FM पर मेरा बहुत ही पसंदीदा गाना 'रोज रोज आंखों तले इक ही सपना पले रात भर काजल जले आँखों में जिस तरह ख़्वाब का दिया जले 'बज रहा था ........ ख़्वाब, रात ,नींद , ख़्वाहिशें,उम्मीदें ये कविता,ग़ज़ल  में सबसे ज्यादा लिखे जाने वाले लफ़्ज हैं ,ऐसा मुझे लगता है और हो भी क्यों न    ज़िंदगी भी इन्ही   लफ्जों के इर्द गिर्द घूमती रहती है ..... ख़ैर गाना सुनते सुनते इक  दो लाइन मेरे जेहन में भी आयीं 'बंद आँखों से जहाँ मुझको समंदर सा लगा /जागी आँखों से वहां रास्ता बंजर सा लगा  ...........Mobile note book ने इस बार भी ख़ुद पर मेरे ज़ज्बात को लिखने  में और हाँ भूल न जाने में अपनी मदद दी .........आज जैसे तैसे इस   ग़ज़ल को पूरा करने की कोशिश की है .........अब तक कोशिशे ही चल रही हैं क्यों कि लिखने की 'क़ाबिलियत' यकीनन अब भी मुझमे नहीं है ...हाँ मन का कहा मानकर कोशिशें बदस्तूर जारी हैं ...... बंद आँखों से जहाँ मुझको समंदर सा लगा  जागी आँखों से वहाँ रास्ता बंजर  स...