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भय अजय होने न दूँगी

  इस अपरिमित ऊर्जा का तनिक क्षय होने न दूँगी। भय अजय होने न दूँगी। केंद्र को विकेन्द्र होते देखना असहाय होकर। यत्न कोई भी न करना हो खड़े निरुपाय होकर। ये सदा सामर्थ्य की लगती मुझे अवहेलना है। इसलिए बिखराव के ये चक्र सारे भेदना है। गति सुगन्धों की हवाओं से मैं तय होने न दूँगी। भय अजय होने न दूँगी। चेतना की दृष्टि ही विस्तार से परिचय कराती। फिर न कोई शक्ति हमसे व्यर्थ का अभिनय कराती। सीख जाते हम अगर हर सत्य अंगीकार करना। फिर बहुत आसान है जीवन सहज स्वीकार करना। अब ये मानस का गगन मैं धुँधमय होने न दूँगी। भय अजय होने न दूँगी। बाह्य जीवन पर जगत का भी तो कुछ अधिकार होता। आंतरिक जीवन मगर इस चित्त के अनुसार होता। बस यहीं मैं आत्मा का मांगलिक शृंगार करके। और फिर प्रतिबिंब से उसके रहूँगी सज सँवर के। सृष्टि के शाश्वत नियम की भंग लय होने न दूँगी। भय अजय होने न दूँगी। सोनरूपा १६ जनवरी २०२२ {मन के बिखराव को एकत्र करने की जो कुछ चेष्टायें हैं उनमें से एक लिखना है.ये गीत इसी की परिणति है}

गोपालदास नीरज की जन्मजयंती पर

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  नीरज जी पीड़ा के,दर्शन के,प्रेम के कवि कहलाए जाते हैं। गीतों के वो प्रथम हिमालयीन निर्मल जल जिसका यदि आचमन कर लिया जाए तो जीवन से परिचय हो जाये। प्रीति से प्रतीति की एक डोर। जीवन के प्रारब्ध को बाँचता हुआ संत स्वर जिसका शब्द-शब्द मंत्र हो यानी गोपालदास 'नीरज'।आज उनकी जन्मजयंती है।वो स्वयं को अपने गीतों की सन्तूरी ध्वनियों में स्पंदित कर गए हैं। उन्हें विनम्र प्रणाम प्रेम का पंथ सूना अगर हो गया, रह सकेगी बसी कौन-सी फिर गली? यदि खिला प्रेम का ही नहीं फूल तो, कौन है जो हँसे फिर चमन में कली? प्रेम को ही न जग में मिला मान तो यह धरा, यह भुवन सिर्फ़ श्मशान है, आदमी एक चलती हुई लाश है, और जीना यहाँ एक अपमान है, आदमी प्यार सीखे कभी इसलिए, रात-दिन मैं ढलूँ, रात-दिन तुम ढलो। प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए, जिस जगह मैं थकूँ, उस जगह तुम चलो। #गोपाल_दास_नीरज

शब्दिता

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  आज शाम साहित्यिक संस्था 'शब्दिता' के तत्वावधान में नववर्ष और गीतऋषि आदरणीय गोपालदास नीरज के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस काव्य गोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में उसहैत की लोकप्रिय चेयरपर्सन श्रीमती सेनरा वैश्य उपस्थित रहीं। सरस्वती वंदना से कार्यक्रम आरंभ हुआ।तत्पश्चात सोनरूपा विशाल ने दिसम्बर माह का 'साहित्यगन्धा अटल विशेषांक' श्रीमती सेनरा वैश्य को भेंट किया एवं शॉल ओढ़ाकर उनका सम्मान किया। तदुपरांत गोष्ठी प्रारम्भ हुई।सभी सदस्याओं ने जीवन के विविध पक्षों पर आधारित विषय पर अपनी अपनी रचनाएँ सुनाईं एवं नीरज जी को अपनी भावांजलि अर्पित की। काव्य गोष्ठी का संचालन डॉ. शुभ्रा माहेश्वरी ने किया। इस अवसर पर श्रीमती मंजुल शंखधार,दीप्ति जोशी गुप्ता,डॉ कमला माहेश्वरी,कुसुम रस्तोगी,ममता नौगरिया,रीना सिंह,पूनम रस्तोगी,गायत्री प्रियदर्शनी,डॉ. प्रतिभा मिश्रा,सरला चक्रवर्ती,सुषमा भट्टाचार्य,मधु राकेश,सरिता चौहान,उषाकिरण रस्तोगी,उपस्थित रहीं। अंत में डॉ सोनरूपा ने सभी का आभार व्यक्त किया।

डॉ. उर्मिलेश और हिन्दी ग़ज़ल

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  आदरणीय वसीम बरेलवी जी पापा डॉ. उर्मिलेश की सृजन यात्रा के साक्षी रहे हैं. इसीलिए उनको 'डॉ. उर्मिलेश और हिन्दी ग़ज़ल' देने का जब अवसर मिला तो मुझे बहुत अच्छा लगा. धीरे-धीरे किताब उन हाथों में पहुँच रही है जहाँ इसे होना चाहिए था. पुस्तक प्राप्त करने के लिए आप इस लिंक पर जाएं https://www.amazon.in/.../ref=cm_sw_r_apan_glt_fabc... #drurmilesh

मन नया बना रहे

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  मन नया बना रहे पिछले तीन-चार साल से नए साल पर कोई रेसोल्यूशन लेना छोड़ दिया.ऐसा भी नहीं कि जब पहले संकल्प लेती थी तो उसे पूरा करने की कोशिश नहीं करती थी या पूरे नहीं कर पाती थी.कितने संकल्प लिए और पूरे भी किये.लेकिन धीरे-धीरे लगने लगा कि केवल नया साल ही नहीं जीवन का हर आने वाला पल नया है और वो नया पल क्या स्थिति ला दे,क्या प्रेरणा दे दे,क्या ज़िद ठनवा दे कुछ नहीं पता. उसके परिणाम में कुछ मनचाहा हो जाये तो अच्छा लगता है और नहीं भी कुछ मिलता तो भी ये कहते देर नहीं लगाती कि अरे तो क्या हुआ जो नहीं मिला ? नहीं मिलना था सो नहीं मिला. सुख के भी अपने पैमाने बन गए हैं.अब तो जी खोल के तब भी ख़ुश हो जाती हूँ जब अपने आप कोई हर्बल टी इंवेंट कर लेती हूँ और उसका सिप ले लेकर अपनी पीठ थपथपाती हूँ. चेहरे पर बढ़ते फ्रेकल्स की चिंता भी कम हुई और चेहरे पर बिना कुछ लगाए बाहर जाने की इच्छा अब पूरी करने लगी हूँ तो उस पर भी ख़ुश हूँ. कितना कम जानती हूँ और कितना अधिक है जानने को इसका मलाल अब कम होता है क्योंकि ये भी पहचान गयी हूँ कि जब चुनिन्दा चीजों को जानने में मैं ही जी लगाती हूँ तो क्यों बिना जी वाला काम करूँ

मुझको मंज़िल तक ले जाने वाले सब गलियारे प्रिय हैं

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  सूर्य उदय के बानक बनकर आये जो अँधियारे प्रिय हैं। मुझको मंज़िल तक ले जाने वाले सब गलियारे प्रिय हैं। जाने कितनी मंशाओं ने आरोपों की झड़ी लगाई मेरी स्वीकृति के द्वारे पर विद्वेषों की कड़ी लगाई मुझे देखकर चुभन सह रहे नयन मुझे पनियारे प्रिय हैं। मुझको मंज़िल तक ले जाने वाले सब गलियारे प्रिय हैं। आत्मचेतना की क्यारी में मेरे श्रम के फूल खिले जब उन्हें देख अनुकूल हवाओं के भी रुख़ प्रतिकूल मिले तब चकित हुई थी किंतु आज वो स्याह मुझे उजियारे प्रिय हैं। मुझको मंज़िल तक ले जाने वाले सब गलियारे प्रिय हैं। प्रश्न न होते तो उत्तर देने को क्या मैं उद्यत होती समय नहीं जो अवसर देता क्या ख़ुद से मैं अवगत होती मुझको संकल्पित नद करते ये सारे नदियारे प्रिय हैं। मुझको मंज़िल तक ले जाने वाले हर गलियारे प्रिय हैं। मुझे विरोधों,अवरोधों ने नित नूतन संकल्प दिए हैं जिन तीरों से घाव मिले मैंने उनसे ही घाव सिए हैं सुदृढ़ हुई जिन पर चलकर मैं कंटक वो अनियारे प्रिय हैं। मुझको मंज़िल तक ले जाने वाले हर गलियारे प्रिय हैं। सोनरूपा २२-१२-२१ {मुख़ालफ़त से मेरी शख़्सियत सँवरती है मैं दुश्मनों का बड़ा एहतराम करता हूँ ~बद्र साहब बस इत

मेरी कल्पित अभिलाषा को, तुम ऐसा विन्यास तो देना

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  मेरी कल्पित अभिलाषा को तुम ऐसा विन्यास तो देना, बेशक मेरे साथ न चलना पर अपना एहसास तो देना. जैसे अँखुआती धरती भी फूलों की आशा होती है जैसे बूँदों की छन-छन भी अम्बर की भाषा होती है तुम भी ऐसा आलम्बन बन, मुझको इक उल्लास तो देना. डग भर की दूरी को शायद हम दोनों ही नाप न पाएं उष्म क्षणों के अनुपम अनुभव की शायद हम भाप न पाएं फिर भी रिक्त-रिक्त पावस को सिक्त-सिक्त मधुमास तो देना. विधि का लेखा मेट सके जो ऐसी विधि हमने कब जानी पास नहीं है जो अपने वो निधि हमने अपनी कब मानी लेकिन सबकुछ पा लेने का, तुम मुझको विश्वास तो देना. #sonroopa_vishal