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विचार

 आप देश में फैली कुरीतियों पर बड़ी आसानी से वक्तव्य दे सकते हैं, क़ाग़ज़ भर सकते हैं।आपका बुद्धि जीवी होना ख़तरे में पड़ जायेगा यदि आप अपने अन्वेषी नज़रिये से अच्छाई में भी बुरे से बुरा न खोज पाये तो|  भ्रष्टाचार,बेरोज़गारी,आतंकवाद,ग़रीबी,अशिक्षा,नारी अस्मिता,शोषित वर्ग की अधिकारों के प्रति अज्ञानता,अलगाववाद न जाने कितने कोढ़ हैं भारत के शरीर पर जिन का होना पल-पल हमें शर्मिंदा करता है| लेकिन क्या हमारा विशाल गणत्रंत,भारतीय संस्कार,मूल्य,वैज्ञानिक प्रगति,ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक समृद्धता ,विविध धर्म, विविध ढंग,विविध संस्कृति,सैन्य सम्पदा,औद्योगिक क्षमता,आधुनिक प्रगति,अन्न सम्पदा,वैदिक खज़ाना हमारे लिए अपने देश पर गर्व करने के कारण नहीं हैं?  अगर सिर्फ़ हमेशा ही नकारात्मक पहलूओं को ही दोहराया जाता रहे तो आप कितने सकारात्मक क्षणों और उनसे मिलने वाले सुकून को खो रहे हैं इसका आप को शायद ही भान हो|लेकिन ज़रा उन सैनिकों से पूछिए जिनके लिए उनका देश ही उनके लिए सब कुछ है उनसे अपने देश के लिए उनकी भावना पूछिए और फ़िर उनका  गर्वोन्मत सीना देखिये ।ज़रा सोचिये वो भी आपके नकारात्मक रिमार्क्...

बाँटना ही है तो थोड़े फूल बाँटिये

आप देश में फैली कुरीतियों पर बड़ी आसानी से वक्तव्य दे सकते हैं , क़ाग़ज़ भर सकते हैं।आपका बुद्धि जीवी होना ख़तरे में पड़ जायेगा यदि आप अपने अन्वेषी नज़रिये से अच्छाई में भी बुरे से बुरा न खोज पाये तो|  भ्रष्टाचार , बेरोज़गारी , आतंकवा द , ग़रीबी , अशिक्षा , नारी अस्मिता,शोषित वर्ग की अधिकारों के प्रति अज्ञानता,अलगाववाद न जाने कितने कोढ़ हैं भारत के शरीर पर जिन का होना पल-पल हमें शर्मिंदा करता है| लेकिन क्या हमारा विशाल गणत्रंत , भारतीय संस्कार , मूल्य , वैज्ञानिक प्रगति , ऐतिहासिक , सांस्कृतिक , सामाजिक समृद्धता , विविध धर्म , विविध ढंग , विविध संस्कृति , सैन्य सम्पदा , औद्योगिक क्षमता , आधुनिक प्रगति , अन्न सम्पदा , वैदिक खज़ाना हमारे लिए अपने देश पर गर्व करने के कारण नहीं हैं ? अगर सिर्फ़ हमेशा ही नकारात्मक पहलूओं को ही दोहराया जाता रहे तो आप कितने सकारात्मक क्षणों और उनसे मिलने वाले सुकून को खो रहे हैं इसका आप को शायद ही भान हो|लेकिन ज़रा उन सैनिकों से पूछिए जिनके लिए उनका देश ही उनके लिए सब कुछ है उनसे अपने देश के लिए उनकी भावना पूछिए और फ़िर उनका   गर्वोन्मत सीना देखिये ।ज़रा स...

तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं !!

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धूप ....प्लीज़ आज मत निकलना'अभी दो दिन पहले सुबह से हो रही बारिश के बीच हलकी चमकती धूप से मैंने चुपचाप ये गुज़ारिश की और यक़ीन जानिए धूप साहिबा मान भी गयीं और चल दी ठुमक के वापस आराम करने के लिए | कड़क सर्दियाँ दिन की चूड़ियों जैसी खनखन को रात के ख़ाली कंगन की तरह चुपचाप देती हैं|आज का ये दिन भी थमा हुआ सा बिताने का मन था इसीलिए धूप के मुड़ते ही मैंने बिस्तर की पनाह ली | टी.वी से ज़रा कम यारी है मेरी, लेकिन आज लीक बदलने का दिन था मेरा |लेकिन इतनी ही देर में शिंजन तेज़ी से मेरे पास आये और निक चैनल पर आ रहे ‘मोटू पतलू’ के दर्शक का रूप अख्तियार कर लिया |’चिंगम से बचना मुश्किल ही नहीं इम्पॉसिबल है’,’ख़ाली पेट दिमाग की बत्ती नहीं जलती’ जैसे डायलॉग शिंजन अक्सर दोहराते हैं लेकिन आज मोटू पतलू के समोसे से उठती भाप और डायलॉग मुझे भी दिन भर हँसाते रहे | चैनल बदलते-बदलते NDTV Good Time पर एक प्रिटी सी ब्राइड पर मेरी नज़र थम गयी ,शो चल रहा था ‘बैंड बाजा विद  सव्यसाची मुखर्जी’ और लगभग एक ४५ मिनट के इस प्रोग्राम में शादी की रस्म,तैयारियाँ,गहने,सव्यसाची की डिज़ायनर ज़री साड़ियों ने मेरे कमरे की स...

एक इमोशनल फ़ूल के कुछ मुश्किल पल और उसकी जकड़न

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अगर मैंने दिवम पूछा-दिवम...आज आपके स्कूल में पाकिस्तान में पेशावर के आर्मी स्कूल में मारे जाने वाले बच्चों के लिए साइलेंस रखा गया था |तब मैंने ये नहीं कहा कि आपको मालूम है कि हमारे साइलेंस रखने पर या उन बच्चों के लिए संवेदना जताने पर कुछ लोगों का कहना है कि जब मुंबई में २६/११ का हमला हुआ तो क्या पाकिस्तानियों ने हमारे लिए संवेदना जताई थी जो हिन्दुस्तानी आँसू बहा रहे हैं और पाकिस्तानी भी इतने बदसूरत मंज़र के बात भी नहीं चेते हैं | मुझे मालूम है एक बच्चा संवेदनायें दिल से महसूस करता है भले ही ‘संवेदना’ शब्द उस बच्चे के लिए समझना सबसे कठिन हो | अगर बच्चों ने पूछा...मम्मा संसद किसे कहते हैं ? मैंने संसद के बारे में समझाते हुए ये बिलकुल नहीं बताया कि हमारे रीप्रिसेंटेटिव यहाँ हाथापाई भी करते हैं,गाली देते हैं कुर्सियां फेंकते हैं | अगर कभी मैं बच्चों से धर्म के बारे में बात करूँगी तो यही कहूँगी कि तुम इंसानियत को अपना धर्म मानना लेकिन बचूँगी ये बताने से ‘कि जिस देश में तुम रहते हो वहाँ धर्म में अंधभक्ति सिखाई जाती है,सबसे ज़्यादा फ़साद धर्म की वजह से होते हैं,धर्म सबसे ज़्यादा लची...

फीलिंग नॉस्टॅल्जिक

'फीलिंग  नॉस्टॅल्जिक   ’ फेसबुक पर कुछ दोस्त अपने स्टेटस में अक्सर इसे जोड़ कर अपनी यादें पोस्ट करते  है | मुझे दोस्तों की ये यादें,बातें सबसे बहुत सहज और अच्छी लगती हैं | ' नॉस्टेलजिया  '  यानि  ‘बीते वक़्त  की याद’ | स्मरणहीन के अलावा कोई ऐसा नहीं है जो यादें दोहराता न हो,हम अक्सर भूले बिसरे पल दोहराते हैं |फ़िर आज ऐसी कौन सी नई बात मैं लिखने बैठी हूँ यादों के बारे में ? ये मैंने ख़ुद से पूछा | शायद इसीलिए कि मुझे महसूस होता है कि जो हमारा आज है इसे याद करने वाले ज़रूर  होंगे लेकिन ये यादें इतनी पक्की या पुर सुकून न हों जितनी अब हैं या पहले थीं |  मल्टीटास्किंग लोगों की बढ़ती गिनती ,सिर्फ़ ‘मैं और मेरा’ सर्वनाम जानने वाले लोग,ए फॉर एप्पल से पहले एस फॉर सक्सेस के सिखलाने वाले माँ पिता ,ग से ग्लोबलाइजेशन के आगे अपने ग से गाँव अपनी जड़ों को भूल जाने वाले लोग सिर्फ़ हासिल करने की कोशिश में  हैं पा लेने की नहीं | वो ये सब कर पाते हैं तो सिर्फ़ अपने हसरत और मंज़िल पर नज़र रखने के बाद ,कई यादें कई तहों में दबा लेने के बाद | क्यों कि आगे की रौशनी ...

मेरी आई बॉल्स पलकों में क़ैद हैं

तीन दिन बाद घर वापस आई हूँ ,आदतन इन दिनों आये अखबार खंगाले बिना मुझे चैन नहीं आता, ख़ास-ख़ास ख़बरें पढ़ रही हूँ और अब नींद भी आने लगी है | स्पोंडिलाईटिस का दर्द पिछले कुछ दिनों से परेशान कर रहा है, और यूँ ही पढ़ते-पढ़ते अख़बार के दैनिक कॉलम पर मेरी नज़र गयी है पूरे कॉलम में बस यही बात को मैंने ढंग से  और दो बार पढ़ा है जहाँ डॉ.शिंडलर कहते हैं कि ‘डॉक्टर के पास जाने वालों में से ९९ प्रतिशत को कुछ नहीं हुआ होता है वे डॉक्टर के पास इसीलिए जाते हैं उन्हें अपनी भावनाओं को काबू करने की कला नहीं मालूम ,फिर उन्होंने ये भी बताया की बीमार घोषित किये गए लोगों में भी ज़्यादातर इसीलिए बीमार हैं क्योंकि उनके पास सकारात्मक विचार नहीं’ये पैरा को पढ़कर इसमें से मैंने अपने काम लायक सत निकाल लिया ,कि सोनरूपा तुम भी अपनी छोटी-छोटी तकलीफ़ों को नज़रंदाज़ करना सीखो |मैंने लाइट्स ऑफ कर दी हैं |लेकिन लेटते ही कई बातें नींद में ख़लल डाल रही हैं मेरे आई बॉल्स बंद पलकों में क़ैद हैं और आँखें खुलने का इंतज़ार कर रही हैं मुझे एक ही रास्ता सूझ रहा है कि बस लिख डालूँ,२ बज रहे हैं और मैं टाइप कर रही हूँ | १५ तारीख़ को तिह...

ज़िन्दगी गोज़ ऑन

रघुपति सहाय 'फ़िराक'कहते हैं कि ‘वजूद में हमेशा बासी होने का ख़तरा रहता है’ और शायरी हमें बासी नहीं होने देती,वो हमें हमारी ज़िन्दगी वापस कर देती है’ | सोचें तो अगर ज़िन्दगी अनिश्चित न होती तो हम कितने निश्चिंत होते और निश्चिंतता भी ज़िन्दगी को बासी कर देती है  | अब यहाँ शायरी और ज़िन्दगी दो अलग अलग बातें हैं,लेकिन समानांतर हैं क्यों कि न जाने कितनी ज़िंदगियाँ शायरी में जी ली जाती हैं |ज़िन्दगी का बयान ही तो होती हैं कवितायेँ ,शायरी| पिछले कुछ दिनों से कुछ शाम छत पर टहलने का सबब हेल्थ के लिए अच्छा होने से इतर बादलों की आकृतियों को निहारना,अँधेरा होते ही कभी-कभी घर के सामने बगीचे में सिर्फ़ जुगुनुओं का झुरमुट देखने को मन होना ,रस्ते चलते बच्चे के सिर पर टीप मारकर उसे चौंक कर मुँह बनाते हुए देखना,दैनिक पूजा अर्चना से अलग बस कुछ देर कृष्ण के नाक नक्श को देखते रहना,कभी यूँ ही मन अपनी कोई पुरानी बनारसी साड़ी ठेठ देसी अंदाज़ में पहनने का बहाना ,पारदर्शी शीशे के वास में पनपे मनी प्लांट की बेल की जड़ इशारे करते हुए दिखाई देना और कहना मजबूत बनी रहना तभी ज़िन्दगी मेरे हरे पत्तों जैसी ख़ूबस...