ग़ज़ल
सच मानियेगा बाहर में तब से ग़ज़ल हुई
महफ़िल में रौशनी को नई ज़िन्दगी मिली
इतनी हसीन आपके लब से ग़ज़ल हुई
यूँ तो क़लम संभाले ज़माना गुज़र गया
ये कुछ पता नहीं हमें कब से ग़ज़ल हुई
लम्हात ख़ास जब भी इसमें बयां किए
इक हमसफ़र के जैसी तब से ग़ज़ल हुई
ढाला है जब से इसमें मैंने तुम्हारा अक्स
मेरी नज़र में आला वो सब से ग़ज़ल हुई
वाह वाह !!! बहुत शानदार सुंदर गजल,,,बधाई,,,,
जवाब देंहटाएंrecent post: कैसा,यह गणतंत्र हमारा,
वाह ...क्या बात है ...बहुत सुन्दर और कामयाब ग़ज़ल ...हर शेर काबिले दाद हुआ है ...दाद कबूल करें।
जवाब देंहटाएंसभी शेर लाजवाब
जवाब देंहटाएंसादर
क्या खूब गजल कही आपने सोन रूपा जी बहुत खूबसूरत
जवाब देंहटाएंbehad khoobsurat ghazal .. bahut badhai Sonroopa ..
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जवाब देंहटाएंना जाने अब तक कहाँ छुपाके राखी थी यह रचना ?
बेहतरीन ग़ज़ल.....
जवाब देंहटाएंअनु