मेरी कल्पित अभिलाषा को, तुम ऐसा विन्यास तो देना

 


मेरी कल्पित अभिलाषा को

तुम ऐसा विन्यास तो देना,
बेशक मेरे साथ न चलना
पर अपना एहसास तो देना.
जैसे अँखुआती धरती भी
फूलों की आशा होती है
जैसे बूँदों की छन-छन भी
अम्बर की भाषा होती है
तुम भी ऐसा आलम्बन बन,
मुझको इक उल्लास तो देना.
डग भर की दूरी को शायद
हम दोनों ही नाप न पाएं
उष्म क्षणों के अनुपम अनुभव
की शायद हम भाप न पाएं
फिर भी रिक्त-रिक्त पावस को
सिक्त-सिक्त मधुमास तो देना.
विधि का लेखा मेट सके जो
ऐसी विधि हमने कब जानी
पास नहीं है जो अपने वो
निधि हमने अपनी कब मानी
लेकिन सबकुछ पा लेने का,
तुम मुझको विश्वास तो देना.

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