संदेश

यादों का फलैश बैक

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शायद पाँचवी क्लास की स्टूडेंट थी जब मुझसे क्लास में कहा गया कि ‘आपको एक ऐसा कार्ड बना कर लाना है जिससे हमें कोई अच्छी शिक्षा मिलती हो’!मुझ पर ज़्यादा आईडियाज़ तो नहीं थे , लेकिन ‘मेरा चार्ट सबसे सुंदर हो’ वाली सोच तो थी ! कुछ नहीं समझ में आया तो सोचा मम्मी से कहूँ,जब कि मुझे उन का उत्तर पता था ‘बेटा ख़ुद किया करो अपना काम’ | इतने में पापा बोले ‘लाओ मैं बनाता हूँ’ मेरे लिए आश्चर्य था क्यों कि वक़्त की क मी की वजह से कभी-कभार ही ऐसा होता था कि पापा हमारा पढाई से रिलेटिड को बात किया करते थे , खैर मैं ख़ुश हो गयी पापा ने एक आर्ट पेपर माँगा उसको दो हिस्सों में मोड़ कर उन्होंने बस तीन पिलर बना दिये पहला सबसे ऊँचा, दूसरा उससे कम, तीसरा उससे भी कम फिर तीनों को अलग अलग रंगों से रंग दिया और तीनों पर लिख दिया ‘पहले देश ,फिर माँ फिर और कुछ” मैं कुछ अनमनी सी हो गयी लेकिन उनको बिना जताए और बताए,उस कार्ड में मुझे कुछ भी बहुत सुंदर नहीं लगा मैंने सोचा 'ये कैसा कार्ड है जिसमे बस तीन लाइनें हैं',मैंने बुझे मन से अपने बैग में रख लिया !टीचर को दिखाया या नहीं ये तो याद नहीं! लेकिन जब धीरे धीरे बुद्धि न...

इक दुआ !

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चलते फिरते

दो दिन पहले जी आई पी मॉल के सामने मैं आइस क्रीम से पार्ट टाइम ठंडी एन्जॉय कर रही थी कि वहां मौजूद ज़ी न्यूज़ की संवाददाता ने राय जानने के लिए मेरे आगे माइक कर दिया'३० सेकंड्स में आप हमें बता सकती हैं कि क्या आम महिलाओं के लिए राजनीति में आना मुश्किल है ?अगर वो आती भी हैं तो उनके फ़ैसले उनके नहीं होते,क्या उनकी वजाय उनके पति या उनके राजनीतिक अभिभावक उनके थ्रू रूल करते हैं ?  मैंने उनसे कहा- मैडम ये भी कोई पूछने की बात है , हम स्त्रियों के साथ तो मुश्किलें गर्भ से ही दोस्ती निभाती आ रही हैं बात कीजिये दूसरी वो ये कि 'हमारे यहाँ कौन सी गवर्नमेंट ऐसी है जिसका ख़ुद का रूल चलता हो!कोई भी फ़ैसला लिखा एक पेन से जाता है लेकिन स्याही देने वाले इस शर्त के साथ स्याही सप्लाई करते हैं कि"हमारा भी ध्यान रखना"! इस पर वो संवाददाता बोली कि आप बस वो ही बोलिए जो हम चाहते हैं ! मैंने कहा ..चलिए बोलते हैं कीजिये कैमरा ऑन !

गुफ़्तगू

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अपने दोस्तों को अलग-अलग नामों से पुकारे जाने की, चिढने-चिढ़ाने की परम्परा है बचपन की  ,मैं भी अजब-गज़ब नामों से अपने दोस्तों को आवाज़ देती थी ,मुझे उस वक़्त आज की तरह  फ़िक्र कहाँ थी कि उस दोस्त को बुरा लगा या भला ?सच्ची मुच्ची ,कच्ची पक्की जैसे शब्दों में हमारी दोस्ती फुटबॉल खेलती रहती थी ! कल रात ऐसे ही मैंने दोस्तों की यादों के  साथ बचपन की पिच पर फुटबॉल   मैच खेल रही थी कि चाँद ने आवाज़ दी और बोला ....... ." सुनो मेरा भी एक दोस्त है उसका नाम है गुलज़ार,वो ७६ साल का है और मैं हजारों साल पुराना, तुम्हारी तरह वो भी मुझे बहुत सारे नाम देता है !उससे नाराज़ होना तो दूर मैं तो उसके कंधे पर हाथ रखकर उसकी ख़ुशामद करते हुए अक्सर कहता हूँ यार गुलज़ार तुम ही जो मुझे बूढ़ा नहीं होने देते,तुम अब भी मुझसे करतब करवाते हो ,जब चाहे किसी भी सांचे में मुझे ढाल देते हो और मैं उफ़ भी नहीं करता"! मैंने भी चाँद से एटीट्यूड से  कहा "  ओ चाँद ,मुझे भी अपनी फ़ेरहिस्त में शामिल करो क्यों कि मैंने भी अपने कई लम्हे गुलज़ार के लफ़्ज़ों के बैंक  में फिक्स डिपाज़िट करवा ...

सादगी की उसूल की बातें

मेरे पिता डॉ .उर्मिलेश की ग़ज़ल  का मतला है .... सादगी  की,  उसूल  की   बातें आजकल हैं फ़िज़ूल की   बातें और शायद इसी बात को अनदेखा कर दिया कुछेक उसूलों पर चलने वाले,जिन्हें हम ऊँगलियों पर गिन सकते हैं उनमे से एक आई ए एस 'दुर्गा शक्ति नागपाल' ने,अब वक़्त ही ऐसा हैं कि उसूलों का कोई वजूद ही नहीं।किस्से कहानियाँ में ही सुनिए अब ऐसे चारित्रिक गुण।बावजूद इसके,क्यों कि हैं तो इंसान ही, इसीलिए नकारात्मकता के साथ-साथ आज के समय में भी थोड़ा बहुत सकारात्मक सोचने की भी हिम्मत कर लेते हैं…क्यों कि वक़्त की ज़रुरत भी है हमारी हिम्मत ,एक बात और सोते रहने वाले एक तरह मृत कहलाये जाते हैं और जीते जी खुद को मृत कहलवाना किसे पसंद होगा ? इसीलिए मैंने जिनके शेर से बात शुरू की है तो उन्हीं के चंद  अशआर से दुर्गा के साथ खड़े हुए हाथों में अपना हाथ भी शामिल करती हूँ ……। वजूद अपना ज़रा इस्तेमाल करता चल जवाब खुद ही मिलेंगे सवाल करता चल फिर उसके बाद ज़माने के सह सके पत्थर तू काम ऐसा  कोई बेमिसाल करता चल जो अपनी  बीन पे तुझको नचा रहे हैं यहाँ तू उन सप...

ग़ज़ल

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 ख़ुद  को    मत इंसान समझिए  अच्छा है ,हैवान समझिए  चीखें,टीसें,ज़ख़्मी आँखें  शहरों को शमशान समझिए  मौली चूड़ी ,फ़ीकी मेंहदी  टूटे हैं अरमान समझिए  ग़म का चूल्हा ,रोटी उनकी ख़ूनी दस्तरखान समझिए मातमपुर्सी वक़्ती है अब सब हैं बेईमान समझिए  ख़ातिरदारी  थोड़ी   करिये   शातिर हैं मेहमान समझिए रोज़ ब रोज़ मिलेंगे काँटें फूलों की पहचान समझिए रौनक अफज़ा दिखते हैं ,पर भीतर हैं सुनसान समझिए ............................................हालातों का जायज़ा , लफ़्ज़ों की हिदायतें ! .................................................सोनरूपा !!

ग़ज़ल

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रूहानियत में डूब के जब से ग़ज़ल हुई   सच मानियेगा  बाहर में  तब से ग़ज़ल हुई  महफ़िल में रौशनी को नई ज़िन्दगी मिली   इतनी हसीन आपके लब  से ग़ज़ल हुई यूँ तो क़लम संभाले ज़माना गुज़र गया  ये कुछ पता नहीं हमें कब से ग़ज़ल हुई लम्हात ख़ास जब भी इसमें  बयां किए इक हमसफ़र के जैसी तब से ग़ज़ल हुई ढाला है जब से इसमें मैंने तुम्हारा अक्स मेरी नज़र में आला वो सब  से ग़ज़ल हुई मकतब- पाठशाला