संदेश

कक्षा पाँच में पढ़ने वाली तब मैं थी इक गुड़िया

अक्सर ही मैं दोहराती हूँ एक ज़रूरी बात बचपन में पापा ने बोये जो मुझमें जज़्बात कक्षा पाँच में पढ़ने वाली तब मैं थी इक गुड़िया पापा मुझको कहते थे जादू वाली इक पुड़िया  एक बार ये गुड़िया बोली पापा से ये जाकर पापा सुन्दर सा इक चित्र मुझे देदो बनवाकर! मुझको अपने विद्यालय में प्रथम जगह है पाना मैं कितनी हुश्यार हूँ बच्ची सबको है बतलाना पापा ने कुछ रंग और काग़ज़ मुझसे मंगवाए रबर,पेन्सिल,पैमाना भी संग उसके रखवाये थोड़ी देर में पापा ने इक सादा चित्र बनाया मैंने जब देखा तो मुझको तनिक नहीं वो भाया जलती हुई मोमबत्ती जो संख्या में थीं तीन जिन्हें देख ये मीठी गुड़िया हो बैठी  नमकीन  पहली मोम बत्ती पर लिक्खा 'सबसे पहले देश' दूजी पर 'माँ' तीजी पर 'बाक़ी सब'का  संदेश पापा ने कितनी सुन्दर सी बात मुझे सिखलाई मैंने विद्यालय में सबसे ख़ूब प्रशंसा पाई यही ज़रूरी बात आज मैं सबको बतलाती हूँ सबसे पहले देश प्रेम है सबको जतलाती हूँ फिर मैंने अपनी माँ को सबसे ऊपर जाना है ख़ुद को यदि पँछी माना तो उसको पर माना है उसके बाद मिला जो कुछ भी उसे सहज स्वीकारा पापा की शिक्षा को पूरे मन से यूँ सत्कारा!  

अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये

मेरा ये ख़त घरेलू स्त्रियों के नाम!थोड़ा सा वक़्त निकाल लीजियेगा इसके लिए! मेरी प्यारी सहेलियों, बहुत दिनों से कुछ बताना चाहती थी या शायद कहना चाहती थी तुम सब से !  मैंने अपने घर के अंदर बहुत से प्लांट्स लगा रखें हैं!ज़्यादातर ऐसे हैं जो पानी में भी ख़ूब पनपते हैं !कहीं- कहीं मैंने घर के कोने को एक गाँव सा रूप दे दिया है और वहाँ कुछ इनडोर प्लांट्स रख दिए हैं!कहीं गैस की चिमनी के कोने में छोटे छोटे मिट्टी के,पॉटरी के बर्तनों में पौधे पनपा दिए हैं! मुझे कई बार ऐसा लगा है दरअसल ये हुआ भी है कि मैं दो-तीन दिन के लिए बाहर गयी और लौट कर आई तो देखा मेरे इन प्लांट्स में से कई के पत्ते पीले हो गए हैं जबकि मेरे पीछे इनकी देखभाल में कोई कसर नहीं रहती! तब कई बार मैं सोचती हूँ क्या ये मेरे बिना अकेले हो जाते हैं इसीलिए मुरझा जाते हैं ? मैं इनके पीले पत्ते अलग करती हूँ और इन्हें फिर से हरा भरा बना देती हूँ! तुम सोचोगी ये भी कोई बात हुई,पौधे हैं मुरझायेंगे ही तुम्हारी याद थोड़ी करेंगे! लेकिन तुम्हें पता है मैं अपनी इस सोच से ख़ूब ख़ुश होती हूँ और संतुष्ट भी वो इसीलिए कि मुझे ऐसा लगता है कि ...
चित्र
'यहाँ मज़बूत से मज़बूत लोहा टूट जाता है कई झूठे इकठ्ठे हों तो सच्चा टूट जाता है ' एक पत्रिका के लिए नामवर शायर 'हसीब सोज़'जी के ग़ज़ल संग्रह 'अपनी ज़मीन से' का मजमून(समीक्षा) लिखने का अवसर मिला!यहाँ भी शेयर कर रही हूँ! !! हिंदुस्तानी ज़बान के शायर : हसीब सोज़!! साहित्य की कोई भी विधा क्यों न हो उसने अपने समय की ज़िन्दगी को अपने-अपने तौर पर पेश किया है ! ज़माने के रंग ,तौर तरीक़े ,विसंगतियाँ ,दिल के जज़्बात की सटीक अभिव्यक्ति है हसीब सोज़ साहब की शायरी ! आत्मचिंतन और ख़ुद से मुठभेड़ के बाद उनकी कलम से निसृत शायरी वो वितान रचती है कि महसूस हो हाँ,यहाँ तो हमारे मन बात है ! एक कलमकार का सबसे बड़ा हासिल ये होता है कि वो अपनी शिनाख़्त हासिल कर ले !सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं ,सोशल साइट्स पर ग़ज़लें   पढ़कर कभी-कभी इक शाइर का ये मिसरा मन में कौंधता है- ’कब तलक सुनते रहें हम एक जैसी गुफ़्तगू’  लेकिन अगर हसीब सोज़ जी को पढ़ा जाए तो आप उनके संग्रह ‘अपनी ज़मीन से’ की पहली ग़ज़ल से लेकर आख़िरी ग़ज़ल तक बस हसीब सोज़ को ही पायेंगे किसी और का ध्यान भी आपके ज़ेहन के आसपास से नहीं गुजरेगा ! संग्रह क...

फूल सबके लिए महकते हैं

फूल सबके लिए महकते हैं लोग लेकिन कहाँ समझते है ज़िन्दगी जी रहे हैं हम लेकिन ज़िन्दगी के लिए तरसते हैं वक़्त का एक नाम और भी है लोग मरहम भी इसको कहते हैं रोज़ मिलते नहीं हैं हम ख़ुद से रोज़ ख़ुद से मगर बिछड़ते हैं फूल जैसे जो खिल नहीं पाते फूल जैसे वही बिखरते हैं वक़्त में ख़ासियत है क्या ऐसी वक़्त के साथ सब बदलते हैं

कब तक ?

‘ जब वी मेट’ फिल्म के सीन की तरह क्या हम कागज़ पर ख़ूब भद्दी भद्दी गालियाँ लिखें और उस काग़ज़ को  फ्लश्ड आउट  करके अपनी नाराज़गी को कम कर लें?या आश्चर्य करें इन कमज़र्फों पर जिनकी ज़बान को ताक़त देने वाली मांसपेशियाँ हमारे खून से बनी हैं ! बाहर अंदर ख़ूब शोर है एक पार्टी के सामान्य से नेता द्वारा दलितों की हितैषी कही जाने वाली एक पार्टी की महिला राष्ट्रीय अध्यक्ष के बारे में बेहद ख़राब टिप्पणी की वजह से ! आज दिन सूरज की गर्मी से कम इस घटनाक्रम के ख़िलाफ़ प्रदर्शन से ज़्यादा तपा ! गालियों का विरोध गालियों से ! तेरी माँ होती तो,तेरी बहन होती तो! राजनीति की चालें हम समझते हैं लेकिन  निशाना यानि हम यानि स्त्रियाँ ! क्यों भई? निशाना यानि हम यानि स्त्रियाँ! हम पर तीर चलाने वाला तीरंदाज़ कभी मायूस नहीं होगा क्यों हम वो शिकार हैं जो उसके दायरे में हमेशा से रहे हैं !चरित्रहीनता का सर्टिफिकेट तो स्त्रियों को सेकेंड्स में दे दिया जाता है! अगर आपके वुजूद में राष्ट्रपति,मुख्यमंत्री,एस्ट्रोनोट,रेसलर,पायलट आदि जैसी उपलब्धियाँ शामिल होंगी तब कहा जायेगा कि 'ओहो....एक...

पल पल दिल के पास

'आंवला' हमारे यहाँ से 24 किलोमीटर दूर, हमारी बुआ जी का घर ! ऐसे ही तपन भरे दिन और उनके घर तक का रास्ता,और रास्ते में जामुन के ख़ूब सारे पेड़ और एक ज़िद उन पेड़ों के रखवाले से कि 'भैया हमसे पैसे ले लो लेकिन हमें अपने हाथों से जामुन तोड़ने दो '! ऐसे ही हमारे घर के पास एक मस्जिद उसके पास लगे खट मिट्ठू दोस्त यानि आड़ू, शहतूत और इमली का एक-एक पेड़ और एक इंतज़ार 'कि कब ये पकें और कब हम खाएं'! ऐसे ही बरेली के रास्ते पीले-पीले फूलों से संवरे कुछ पेड़ और एक चाह 'कि इनके साथ मुझे फ़ोटो क्लिक करवाना है ,मेरे सफ़ेद आउटफिट के साथ ये पीले फूल कितने अच्छे लग रहे हैं,इसका डी पी बहुत प्यारा लगेगा ! और आज घर से दिल्ली तक का सफ़र,घनी धूप में सड़क के दोनों ओर नारंगी छतरी से तने गुलमोहर के ख़ूबसूरत पेड़ और एक ख़ुशी' कि उफ़्फ़ कितने सुंदर'! लेकिन फिर डर और फ़िक़्र कि ये भी कहाँ ज़्यादा दिन रहेंगे कि जैसे जामुन,पीले फूलों वाले पेड़,मेरे आड़ू,शहतूत और इमली के पेड़ काट डाले गए हमारी भौतिक सहूलियतों के लिए ! और यूँ भी मानसिक सहूलियतों की टूट फूट की मरम्मत के लिए हमारा मन ही कारीगर है ! अब...

पांडुलिपि पूरी करें हम प्यार की

पांडुलिपि पूरी करें हम प्यार की भाग्य को लिख पंक्तियाँ आभार की साथ मिल हमने रचा है प्रीत को जी रहे हैं श्वांस में संगीत को भावविह्वल है हमारी ज़िन्दगी देख कर हम पर ह्रदय की जीत को इन पलों के सागरी विस्तार की पांडुलिपि पूरी करें हम प्यार की हम क्षणों को गूँथ लें इतना सघन गंध से आबद्ध ज्यों रहता सुमन शिल्प हो जैसे कि हिम की श्रृंखला और नदी सा हो तरंगित हर कथन  आसमां जैसे विशद आकार की पांडुलिपि पूरी करें हम प्यार की