संदेश

असमंजस

क्या लिखूँ ? अ भी हाल ही में कई मौकों पर ब्लॉग और फेसबुक कुछ पोस्ट करते हुए हाथ रुक गए, हुआ यूँ कि पिछले कुछ दिनों पहले अपने देश में ‘खेल दिवस’ मनाया गया तो सोचा कि कुछ इससे रिलेटेड पोस्ट किया जाये लेकिन पोस्ट करती इससे पहले ही ‘हिन्दुस्तान’ अखवार में एक आर्टिकल पढ़ने को मिला जिसका टाइटल था ‘चीन कैसे बना खेलों में सुपर पॉवर’ ...चीन में आज कल एक स्लोगन 'च्च्वी क्व्थी च’ बड़ा प्रसिद्ध है ,इसका मतलब है –खेलों में पूरी शक्ति लगा देना|सरकार और खेल विभाग पूरी तरह इस पर अमल करते हैं विश्व स्तरीय एथलीट बनाने की प्रक्रिया बचपन से ही शुरू हो जाती है किंडरगार्टन से ही प्रतिभावान बच्चों को चुन लिया जाता है और उसका रिज़ल्ट तो हम देख ही  रहे हैं कि लन्दन ओलंपिक में ३८ पदक जीत कर वो अमेरिका से पीछे था ऐसा ही बहुत कुछ जान लेने के बाद  तो एक वारगी लगा कि अपने मित्रों को खेल दिवस की शुभकामना देकर क्यों औपचारिकता निभाई जाये जब कि हम जानते हैं हमारे यहाँ खेल और खिलाड़ी मुश्किलों से  सरवाइव कर पा रहे हैं ........ फिर कुछ दिन से बड़ा शोर हो रहा है ‘सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्...

ग़ज़ल

ग़ज़ल  काग़ज पे घर बहुत से बनाये गए हैं आज   बेघर को सब्ज़  बाग़ दिखाए  गए हैं आज  अख़बार की कतरन में चमकने के वास्ते  बेबात के भी जश्न मनाये गये हैं आज  मायूसियाँ कहीं इन्हें वीरान न कर जाएँ  कुछ हसरतों के मेले लगाये गये हैं आज  हर रात पूछता है बिस्तर मेरा मुझसे  आँखों में कितने ख़्वाब सजाये गये हैं आज 

सूना सूना है सावन तुम्हारे बिना

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ये अंश हैं मेरे पिता डॉ.उर्मिलेश के १९९४ में प्रकाशित पहले संग्रह ‘धुँआ चीरते हुए’में से जिसमें  वे अपनी सृजन यात्रा के कुछ पल याद करते हुए लिखते हैं  “मैंने पहली ग़ज़ल अगस्त १९७१ में हिंदी के मौलिक ग़ज़ल कार स्व.बलवीर सिंह रंग की ग़ज़ल ‘सूनी सूनी है होली तुम्हारे बिना /जिंदगी है ठिठोली तुम्हारे बिना ‘ से प्रभावित होकर लिखी थी (तब ग़ज़ल कहता था लिखता नहीं था ) मेरी पहली ग़ज़ल थी ‘ सूना सूना है सावन तुम्हारे बिना , अब ना लगता कहीं मन तुम्हारे बिना /मंदिरों में गया तो यही स्वर सुना , व्यर्थ जायेगा पूजन तुम्हारे बिना |उस   ग़ज़ल में नौ शेर थे सबमे हिंदी के तत्सम शब्दों का प्रयोग था | मेरी ग़ज़लों अगस्त ७१ से सन ७५ तक की ग़ज़लों में हिंदी के तत्सम शब्दों का आग्रह कुछ अधिक ही रहा |बाद की ग़ज़ल परिवेशगत यथार्थ को उद्घाटित करने वाली थीं उनकी भाषा ,बोलचाल की भाषा के बहुत नज़दीक होती गयी यह सब सायास नहीं हुआ | अत्यंत सहज और अनारोपित ढंग से यह बदलाब आता गया | सोच और भाषा दोनों ही स्तर मैंने बदलाब को आने दिया ,इसे बाधित नहीं होने दिया” “...............................

शुभकामनायें

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स्वतंत्रता दिवस की आप सभी को  बहुत बहुत शुभकामनायें  भारत के अंग्रेजों से स्वतन्त्र होने की ६५ वीं वर्षगाँठ पर सब भारतवासियों को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनायें ............... शीघ्र ही हम स्वयं भी तंत्र के साथ "स्व -तंत्र 'होने की वर्षगाँठ मनाएँ ........... ~ हिंद जय भारत ~

दहकता हुआ दरिया

दहकता हुआ दरिया  केसरिया हिंदुत्व का हरा रंग इस्लाम का रंगों का धर्मों पर हुये दोबारा नामकरण के लिए /नई पहचान के लिए काफ़ी हुए दंगे और थोड़े बहुत भाषण राम रहीम जैसे नाम होते होंगे आराध्य आस्थाओं के पर हॉट टॉपिक भी हैं फ़सादों के लिए सावन ,रमजान ,ईद ,दिवाली जैसे पाक दिन और महीने मौकापरस्ती के हिंसक तीर दागने वालों के लिए साल भर के सबसे बढ़िया दिन   वो कुछ लोग जिन्होंने दंगाई बलवाई उपद्रवी खुदगर्ज जैसे नामों का पेटेन्ट खुद के लिए करा लिया है ये जो चलते फिरते हरदम सक्रिय डायनामाइट्स हैं उनकी डिक्शनरी में ‘इंसानियत’ लफ़्ज को अंडरलाइन किया गया है नोंचने खसोटने के लिए ............ और वो होती रही है रोज   घायल  हर काल खंड में .... ( मेरा पड़ोसी जिला ‘बरेली’ पिछले दो हफ़्ते से मजहबी दंगों से घायल है , कल श्रावणमास का अंतिम सोमवार है जहाँ रमजान और सावन मास जैसे पाक महीने ईश्वरीय आराधन के लिए हैं, वहीँ यहाँ के वाशिंदे कल के दिन के लिए आशंकित ज्यादा हैं और दुआ कर रहे हैं कि अमन चैन बना रहे )  ...

उन दिनों

मेरी पसंदीदा पेंटिग कलाकार 'वर्तन आर्ट ' उन दिनों  उन दिनों चाँद भी हथेलियों पर उतर आता था उन दिनों हथेलियाँ ख़ुशबुओं से महकती थीं उन दिनों हथेलियाँ बस दुआओं के लिए उठती थीं उन दिनों हथेलियों की नावों में  रंग बिरंगी तितलियाँ सवार रहती थीं उन दिनों हथेलियों के उठान प्रेम के आवेग थे आसमान पर उमड़े बादलों की तरह उन दिनों हथेलियों की रेखाएँ भी ईश्वरीय मिलन के रास्ते थे ये जादू था चार हथेलियों का जिसने हथेलियों पर प्रेम की फसल उगा ली थी ये जादू था चार हथेलियों का जिसने समूची धरती को ख़ुद पर पनाह दे दी थी जैसे जादू चल नहीं पाता बिना जादुई ताकत के वैसे थम गया था चार हथेलियों का जादू दो के होते ही अब हथेलियाँ बदन का हिस्सा भर थीं बस ! 

दोष किसका मेरा या तुम्हारा ?

दोष किसका मेरा या तुम्हारा ? ब हुत थके से ,उनीदे से लग रहे हो तुम  कुछ शिकायती से भी , माँओं की लोरियां भी आपने लाडलों को नींद का बिस्तर दे चुकी हैं चौपालों के हुक्कों की गुडगुडाहट भी चुप है चूल्हों की राख भी ठंडी हो चुकी है अब  गाँव से चलें शहरों की ओर  तो  रौशनी से जगमगाते टॉवर रात गए इठला रहे हैं अपने उजालों पर     सड़कों पर भी गिनी चुनी सी रफ्तारों का शोर है बस जारी है तो रोशनियों की चहलक़दमी   श sssssssssssssssssssssssss 'एक नींद की जागीर  सब लूटने चले हैं सोकर ' और तुम हो कि मेरे ख़्वाबों में चहलकदमी कर रहे हो   फिर  क्यों न होगी थकन ,उनींदे दिन ,उबासी साँसे अब बताओ  दोष किसका मेरा या तुम्हारा ?