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ग़ज़ल

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 ख़ुद  को    मत इंसान समझिए  अच्छा है ,हैवान समझिए  चीखें,टीसें,ज़ख़्मी आँखें  शहरों को शमशान समझिए  मौली चूड़ी ,फ़ीकी मेंहदी  टूटे हैं अरमान समझिए  ग़म का चूल्हा ,रोटी उनकी ख़ूनी दस्तरखान समझिए मातमपुर्सी वक़्ती है अब सब हैं बेईमान समझिए  ख़ातिरदारी  थोड़ी   करिये   शातिर हैं मेहमान समझिए रोज़ ब रोज़ मिलेंगे काँटें फूलों की पहचान समझिए रौनक अफज़ा दिखते हैं ,पर भीतर हैं सुनसान समझिए ............................................हालातों का जायज़ा , लफ़्ज़ों की हिदायतें ! .................................................सोनरूपा !!

ग़ज़ल

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रूहानियत में डूब के जब से ग़ज़ल हुई   सच मानियेगा  बाहर में  तब से ग़ज़ल हुई  महफ़िल में रौशनी को नई ज़िन्दगी मिली   इतनी हसीन आपके लब  से ग़ज़ल हुई यूँ तो क़लम संभाले ज़माना गुज़र गया  ये कुछ पता नहीं हमें कब से ग़ज़ल हुई लम्हात ख़ास जब भी इसमें  बयां किए इक हमसफ़र के जैसी तब से ग़ज़ल हुई ढाला है जब से इसमें मैंने तुम्हारा अक्स मेरी नज़र में आला वो सब  से ग़ज़ल हुई मकतब- पाठशाला

!सौभाग्य के अवसर मिले दो प्राण इक प्रण से मिले!

!सौभाग्य के अवसर मिले दो प्राण इक प्रण से मिले! मैंने कल अपना ये पहला गीत लिखा है अब तक बस कुछ अतुकांत कवितायेँ ,मुक्तक और ग़ज़ल लिखने की ही कोशिश की है ,कल पापा के गुरुप्रवर और सौभाग्य से मेरे भी गुरु जी के  विवाह की स्वर्ण जयंती है ......मुझे उन्होंने फोन किया और कहा कि बेटा तुम सब को आना है और पापा को याद करते हुए बोले आज अगर उर्मिलेश  होते तो हमें अपने शब्दों का उपहार ज़रूर देते,ना जाने उत्सव को कितना सुंदर बना देते | उनके इन्ही शब्दों को सुनकर मैंने सोचा शायद मैं कुछ लिख सकूँ उनके लिए .......कल ये गीत मैं उन्हें सस्वर सुनाऊँगी ........पापा के जैसा तो कभी नहीं लिख सकती लेकिन हाँ बहुत मन से लिखा है| सौभाग्य के उपवन खिले  दो प्राण इक प्रण से मिले  नव अंकुरण से वृक्ष तक  जीवन के कटु मधु सत्य तक  संकल्प पथ से ना हिले  दो प्राण इक प्रण से मिले हो प्रेम का तरुवर घना सानंद हों दोनों मना जारी रहें ये सिलसिले दो प्राण इक प्रण से मिले  गंगा की अविरल धार सा  वीणा के झंकृत तार सा  संग...

शुभकामनाएँ

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! दीप पर्व की आप सभी को बहुत सारी शुभकामनाएँ ! दीप की पंक्तियाँ जगमगाएँ प्रीति की सूक्तियाँ गुनगुनाएँ पर्व दीपों का लाए सुमंगल  आप सबको ये शुभकामनाएँ

असमंजस

क्या लिखूँ ? अ भी हाल ही में कई मौकों पर ब्लॉग और फेसबुक कुछ पोस्ट करते हुए हाथ रुक गए, हुआ यूँ कि पिछले कुछ दिनों पहले अपने देश में ‘खेल दिवस’ मनाया गया तो सोचा कि कुछ इससे रिलेटेड पोस्ट किया जाये लेकिन पोस्ट करती इससे पहले ही ‘हिन्दुस्तान’ अखवार में एक आर्टिकल पढ़ने को मिला जिसका टाइटल था ‘चीन कैसे बना खेलों में सुपर पॉवर’ ...चीन में आज कल एक स्लोगन 'च्च्वी क्व्थी च’ बड़ा प्रसिद्ध है ,इसका मतलब है –खेलों में पूरी शक्ति लगा देना|सरकार और खेल विभाग पूरी तरह इस पर अमल करते हैं विश्व स्तरीय एथलीट बनाने की प्रक्रिया बचपन से ही शुरू हो जाती है किंडरगार्टन से ही प्रतिभावान बच्चों को चुन लिया जाता है और उसका रिज़ल्ट तो हम देख ही  रहे हैं कि लन्दन ओलंपिक में ३८ पदक जीत कर वो अमेरिका से पीछे था ऐसा ही बहुत कुछ जान लेने के बाद  तो एक वारगी लगा कि अपने मित्रों को खेल दिवस की शुभकामना देकर क्यों औपचारिकता निभाई जाये जब कि हम जानते हैं हमारे यहाँ खेल और खिलाड़ी मुश्किलों से  सरवाइव कर पा रहे हैं ........ फिर कुछ दिन से बड़ा शोर हो रहा है ‘सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्...

ग़ज़ल

ग़ज़ल  काग़ज पे घर बहुत से बनाये गए हैं आज   बेघर को सब्ज़  बाग़ दिखाए  गए हैं आज  अख़बार की कतरन में चमकने के वास्ते  बेबात के भी जश्न मनाये गये हैं आज  मायूसियाँ कहीं इन्हें वीरान न कर जाएँ  कुछ हसरतों के मेले लगाये गये हैं आज  हर रात पूछता है बिस्तर मेरा मुझसे  आँखों में कितने ख़्वाब सजाये गये हैं आज 

सूना सूना है सावन तुम्हारे बिना

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ये अंश हैं मेरे पिता डॉ.उर्मिलेश के १९९४ में प्रकाशित पहले संग्रह ‘धुँआ चीरते हुए’में से जिसमें  वे अपनी सृजन यात्रा के कुछ पल याद करते हुए लिखते हैं  “मैंने पहली ग़ज़ल अगस्त १९७१ में हिंदी के मौलिक ग़ज़ल कार स्व.बलवीर सिंह रंग की ग़ज़ल ‘सूनी सूनी है होली तुम्हारे बिना /जिंदगी है ठिठोली तुम्हारे बिना ‘ से प्रभावित होकर लिखी थी (तब ग़ज़ल कहता था लिखता नहीं था ) मेरी पहली ग़ज़ल थी ‘ सूना सूना है सावन तुम्हारे बिना , अब ना लगता कहीं मन तुम्हारे बिना /मंदिरों में गया तो यही स्वर सुना , व्यर्थ जायेगा पूजन तुम्हारे बिना |उस   ग़ज़ल में नौ शेर थे सबमे हिंदी के तत्सम शब्दों का प्रयोग था | मेरी ग़ज़लों अगस्त ७१ से सन ७५ तक की ग़ज़लों में हिंदी के तत्सम शब्दों का आग्रह कुछ अधिक ही रहा |बाद की ग़ज़ल परिवेशगत यथार्थ को उद्घाटित करने वाली थीं उनकी भाषा ,बोलचाल की भाषा के बहुत नज़दीक होती गयी यह सब सायास नहीं हुआ | अत्यंत सहज और अनारोपित ढंग से यह बदलाब आता गया | सोच और भाषा दोनों ही स्तर मैंने बदलाब को आने दिया ,इसे बाधित नहीं होने दिया” “...............................